Dharmendra Rajpoot

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अरावली का विनाश: खनन बनाम हरियाली

राजस्थान और हरियाणा के सीमावर्ती गाँवों में अरावली की पहाड़ियां अवैध खनन का शिकार हो रही हैं। ग्रामीण समुदाय इन पहाड़ियों को अपने रक्षक और जल संचयन का मुख्य स्रोत मानते हैं। खनन माफिया और पर्यावरण प्रेमियों के बीच बढ़ते संघर्ष ने ग्रामीण पारिस्थितिकी तंत्र को पूरी तरह बिगाड़ दिया है, जिससे वन्यजीव अब रिहाइशी […]

हिमालयी क्षेत्रों में ‘लैंडस्लाइड’ और अनियंत्रित विकास

उत्तराखंड और हिमाचल के ग्रामीण क्षेत्रों में बादल फटने और भूस्खलन की घटनाएं बढ़ गई हैं। स्थानीय निवासियों का मानना है कि बड़े बांधों का निर्माण और पहाड़ों की कटाई इस आपदा को और भयावह बना रही है। विकास की चाहत और पर्यावरण संरक्षण के बीच छिड़ी इस जंग ने कई गांवों का अस्तित्व खतरे […]

तटीय गांवों में समुद्र का बढ़ता स्तर: एक मौन संकट

ओडिशा और पश्चिम बंगाल के तटीय गांवों में समुद्र का पानी अब खेतों में घुसने लगा है। बढ़ते जल स्तर और बार-बार आने वाले चक्रवातों ने उपजाऊ भूमि को खारा बना दिया है। मछुआरे और किसान अपने पुश्तैनी घरों को छोड़ने पर मजबूर हैं। यह जलवायु परिवर्तन के उस प्रभाव को दर्शाता है जहाँ प्रकृति […]

पराली का दहन: खेती और पर्यावरण के बीच का संघर्ष

उत्तर भारत के गाँवों में अक्टूबर और नवंबर के दौरान ‘स्लैश और बर्न’ की समस्या एक बड़े विवाद का केंद्र बन जाती है। किसान अपनी अगली फसल के लिए समय बचाने हेतु पराली जलाते हैं, जिससे निकलने वाला धुआँ न केवल शहरों का दम घोंटता है, बल्कि ग्रामीण मिट्टी की उर्वरता को भी नष्ट कर […]

सूखते जलस्रोत और बुंदेलखंड का बदलता स्वरूप

बुंदेलखंड के ग्रामीण इलाकों में जल संकट अब केवल गर्मियों तक सीमित नहीं रहा। जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून की अनिश्चितता ने पारंपरिक तालाबों और कुओं को सुखा दिया है। ग्रामीण महिलाएं पानी के लिए मीलों पैदल चलने को मजबूर हैं। यह केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक-आर्थिक संकट बनता जा रहा […]

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